दरिया साहब (बिहार वाले) / महान निर्गुण सन्त

पुरुष भेजा मोहि गुण हितकारी

जीव चेतन नर्क उबारी ।

  • ॥ साहेब सत् नाम ॥

  • ॥ साहेब सत् नाम ॥

दरिया साहब बिहार वाले की जीवनी


दरिया साहब का जन्म बिहार प्रदेश के जिला शाहाबाद ग्राम धरकंधा(ढरकना) नामक गाँव में विक्रम संवत् 1691 (सन् 1634 ई0) में कार्तिक पुर्णिमा को हुआ था । आजकल यह ग्राम धरकंधा जिला रोहतास सासाराम में पड़ता है ॥ जैसा कि उल्लेख है-

संवत् सोलह सौ इक्यान्वे, कार्तिक पूरन जान ।
मातु गर्भ से प्रकट भये, रहेव दो घड़ी आन ॥

इनके पिता का नाम पृथुदेव उर्फ़ पूरनशाह 'पीरू' था । जो उज्जैन वन्शीय क्षत्रीय थे । इनका पालन पोषण पीरू ने किया । इनके वास्ताविक पिता शाहाबाद जिले के बराव नामाक ग्राम में कुँवरधीर नामक राजपूत सरदार थे । जो मुसलमान शासकोँ द्वारा युद्ध में मारे गये । उस समय दरिया साहब की माता गर्भवती थी और किसी तरह भटकते हुए धरकंधा पहुँची और पूरनशाह के घर रहने लगी । वहीं पर कुछ दिनों के बाद दरिया साहब का जन्म हुआ । पूरनशाह पुत्र को पाकर बहुत प्रसन्न हुए ।

जब दरिया साहब एक महीने के हुए तो परमात्मा 'सत्पुरुष' ने प्रकट होकर उनकी माता से इनका नाम 'दरिया' रखने को कहा । माँ ने वैसा ही किया । जब दरिया साहब ने परम देदीप्यमान सत्पुरुष को देखा तो गदगद होकर परमात्मा को नमस्कार किया । इनकी माता इस रहस्य को समझ न सकीं । दरिया साहब जब नौ वर्ष के हुए तो इनका विवाह शाहमती नामक कन्या के साथ कर दिया गया । दरिया साहब जब पन्द्रह वर्ष के हुए तो इन्हेँ संसार से विरक्ति उत्पन्न होने लगी ।

दरिया साहब जब सोलह वर्ष के हुए तो वे स्वप्न मेँ 'सबद' (दिव्य उपदेश के पद) का ध्यान होता था तथा जागने पर भी इन्हे स्मरण रहता था । इन्हेँ अमरलोक का ध्यान होने लगा एवं पूर्वजन्म की बातें भी याद आने लगी । बीस वर्ष की अवस्था में इन्हें पूर्ण ज्ञान एवं सिद्धांत प्राप्त हो गया ।

दरिया साहब ने देखा की काल (यमराज) जीवोँ कू तरह-तरह के जालों में फ़ँसाकर उन्हेँ कष्ट दे रहा है । जीव परमात्मा को भूलकर देवी-देवताओं, मूर्तिपूजा, भेद-भाव, उँच-नीच, कनक-कामिनी के फन्द में पड़कर अनेक कष्ट को भुगत रहा है ।

कनक- कामिनी के फन्द में, ललचि मन लपटाय ।
कलपि-कलपि जीव जरत है, मिथ्या जन्म गवाय ॥

सद्गुरु ने जीव कल्याण हेतु मूर्तिपूजा, मांस- मदिरा, जीव हिंसा आदि आडम्बरों का विरोध किया । उन्होंने परमात्मा की सच्ची भक्ति पर बल दिया । पहले तो इनके उपदेश कुछ लोगो को अटपटे लगे परन्तु बाद में लोग समर्थक बन गये । इनके माता- पिता तथा भाइयों ने भी इनके उपदेशों को सहर्ष स्वीकार किये ।

दरिया साहब ने बीस ग्रन्थों की रचना की, जो निम्न हैं- दरिया सागर, अमर सार, भक्ति हेतु, ज्ञान रतन, प्रेममूला, अग्रज्ञान,ग़णेशगोष्ठी, ब्रम्हविवेक, निर्भयज्ञान, ज्ञानमूल, विवेकसागर,गर्भचेतावन, ज्ञानदीपक, कालचरित्र, दरियानामा, जनसांगी, सहस्रानी, ज्ञानस्वरोदय, रमेश्वरगोष्ठि तथा बीजक ।
दरिया साहब पाँच भाई एक बहन थे, जो इस प्रकार हैं - दरिया, बस्ती, फक्कर, उजियार, दलदास एवं बहन बुद्धिमती थीं । इनके गुरु का नाम स्वयं 'सत्' थे ।ये महात्मा 146 वर्ष तक अपनी प्रखर ज्ञान रश्मियों से प्रकाशित करने के पश्चात विक्रम संवत् 1837 (सन् 1780 ई0) में सतलोक प्रस्थान किये । जैसा कि प्रमाणित उल्लेख है -

संवत् अट्ठारह सौ सैंतीस, गयो पुरुष के पास ।
जो जन शबद विवेकिया, मिट जाये यम त्रास ॥
भादों वदी औ चौथ के, वार रहेव रविवार ।
सवा जाम जब रैनि गयो, दरिया गवन विचार ॥

नरसिन्ह साहेब

दरियापन्थ के प्रचारक व सेवक

दरिया साहेब

दरिया पन्थ के जनक

अरुण दास

दरियापन्थ के प्रचारक व सेवक

दरिया साहेब ने सत्पुरुष की प्राप्ति के लिये अपने विचार अपने लिखे ग्रन्थों में समाहित किया है

सत्गुरु दरिया साहब के सिद्धांत

दरिया साहब के 11 मुलभूत सिद्धांत हैं


*** 1 ***

एक 'सत्पुरुष' ब्रम्ह की उपासना करो । वही इस जीव का एकमात्र उद्धारक है।

*** 2 ***

वह 'सत्पुरुष' ब्रम्ह अनादि और नानात्व से परे सदा एक है।

*** 3 ***

वह 'सत्पुरुष' ब्रम्ह,शाश्वत, अखण्ड, अजन्मा,अवतार से परे ,सत स्वरुप, एक रस, निर्गुण-सगुण से परे , माया गुणातीत, सर्वज्ञ,अखिल ब्रम्हाण्ड का द्रष्टा,परम दयालु,सर्वजुणागार, सर्व सामर्थ्य, दिव्य-चक्षु द्वारा दर्शन-सुलभ तथा पहचान में आने वाला है ।

*** 4 ***

वह 'सत्पुरुष' ब्रम्ह ईश्वर या परमेश्वर से परे और उससे श्रेष्ठ है । पारमार्थिक सत्ता वाला है ।

*** 5 ***

ईश्वर व्यवहारिक सत्ता वाला है । सृष्टि सृजन करना, पालन करना और संहार करना उसका कार्य है । ईश्वर की एक संज्ञा आदि ब्रम्ह है । वही आदि ब्रम्ह माया की विभूति धारण कर ईश्वर की उपाधी ग्रहण करता है । ईश्वर की उपासना से सावधि मुक्ति प्रप्ति होती है । पुण्य भोग के पश्चात मृत्यु लोक में आना पड़ता है । इस प्रकार पुनः पुनरागमन चक्र चालू हो जाता है ।

*** 6 ***

'सत्पुरुष' ब्रम्ह की उपासना से अचल निर्वाद पद प्राप्त होगा, जो सावधि से परे और चारों प्रकार की मुक्ति से श्रेष्ठ है ।

*** 7 ***

जीव की भी एक संज्ञा ब्रम्ह है जो अद्वैत-ब्रम्ह के अर्थ में प्रयुक्त है। अद्वैत का अर्थ यह है कि सभी जीवात्मा चाहे ,वए किसी योनि के भुक्त हों सभी एक हैं । भिन्न-भिन्न नहीं हैं । 'सत्पुरुष'(अनादि-ब्रम्ह) ईश्वर(आदि ब्रम्ह) और जीव तीनों क अस्तित्व अपना है । तीनों अलग-अलग हैं । तीनों अविनाशी हैं ।

*** 8 ***

जीव, ईश्वर या 'सत्पुरुष' को प्राप्त कर सकता है । किन्तु जीव कभी भी ईश्वर या 'सत्पुरुष' ब्रम्ह नहीं हो सकता है।

*** 9 ***

सच्चा अहिंसक सत्यवादी ही 'सत्पुरुष' की उपासना करने का अधिकारी है । इसलिये सदा सत्य बोलो और प्राणी मत्र पर दया बर्तो ।

*** 10 ***

कार्य-फलासक्ति ही बन्धन का कारण है । इसलिये निष्काम्भाव द्वारा सकाम कर्मों का त्याग करो ।

*** 11 ***

सारे प्राणी मात्र की आत्मा को एक हीं जीवात्मा की एक-एक इकाई समझो या अपने ही आत्मा का प्रतिरुप हरेक प्राणी की आत्मा को समझो ।

कृतियाँ

दरिया साहब की स्व-रचित 20 ग्रन्थ हैं

कृतियाँ मिलीं

दो शब्द

    अमरसार

    ग्रन्थ
    नाम : अमरसार
    लेखक : दरिया साहब
    विषय : समाज की कुरीतियों के बारे में

    जगसांगी

    ग्रन्थ
    नाम : जगसांगी
    लेखक : दरिया साहब
    विषय : समाज की कुरीतियों के बारे में

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    आश्रम

    दरिया साहब के आश्रम तथा गद्दियां

    धरकंधा

    बड़की तेलपा

    डंसी

    मिर्जापुर

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